Satpura Thermal Power Plant : सारणी। मध्य प्रदेश की जीवनरेखा कही जाने वाली नर्मदा नदी की सबसे बड़ी सहायक तवा नदी और सतपुड़ा के घने जंगलों के बीच प्रस्तावित 660 मेगावाट की नई बिजली यूनिट को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। सारणी स्थित सतपुड़ा थर्मल पावर प्लांट में करीब 12 हजार करोड़ रुपए की लागत से बनने वाली इस परियोजना पर पर्यावरणीय तथ्यों को छिपाने और गलत जानकारी देकर क्लीयरेंस लेने के आरोप लगे हैं।
पर्यावरणीय मंजूरी पर सवाल
जानकारी के अनुसार प्लांट प्रबंधन ने पर्यावरणीय अनुमति के लिए जो दस्तावेज प्रस्तुत किए हैं, उनमें कई तथ्यों को गलत तरीके से दर्शाने का आरोप लगाया जा रहा है। प्रबंधन का दावा है कि नई यूनिट उनकी स्वयं की जमीन पर बनाई जा रही है और इससे डैम या पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं होगा।
वहीं वन विभाग का कहना है कि परियोजना के संबंध में उनसे कोई अनुमति नहीं ली गई है और न ही उन्हें आधिकारिक जानकारी दी गई है।
जहां पक्षियों की आवाज, वहां प्रस्तावित है निर्माण
परियोजना स्थल के निरीक्षण में यह क्षेत्र घने जंगल, साफ जल स्रोत और समृद्ध जैव विविधता वाला नजर आया। प्रस्तावित निर्माण स्थल के आसपास बड़ी संख्या में पेड़, वेटलैंड और पक्षियों का बसेरा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यहां प्रवासी पक्षियों का भी आगमन होता है।
बताया जा रहा है कि नई यूनिट के लिए तवा डैम के करीब 6 एकड़ जलमग्न क्षेत्र को पाटा जा सकता है। इसके अलावा सैकड़ों पेड़ों की कटाई भी प्रस्तावित है।
छह बड़े दावों पर विवाद
परियोजना को लेकर प्लांट प्रबंधन के दावों और जमीनी हकीकत में अंतर होने के आरोप लगाए जा रहे हैं।
डैम को नुकसान नहीं होने का दावा
प्रबंधन का कहना है कि डैम और जल क्षेत्र प्रभावित नहीं होगा, जबकि स्थानीय स्तर पर यह आरोप है कि निर्माण के लिए जलमग्न क्षेत्र का हिस्सा भरा जाएगा।
वन्यजीवों की मौजूदगी कम बताई गई
दस्तावेजों में 10 किलोमीटर क्षेत्र में सीमित वन्यजीव होने का उल्लेख किया गया, जबकि वन विभाग के अनुसार क्षेत्र में कई संरक्षित वन्यजीव प्रजातियां पाई जाती हैं।
टाइगर कॉरिडोर की दूरी पर विवाद
प्रबंधन ने टाइगर कॉरिडोर को परियोजना से दूर बताया है, लेकिन वन्यजीव विशेषज्ञों का दावा है कि यह क्षेत्र सतपुड़ा-मेलघाट टाइगर कॉरिडोर के बेहद करीब स्थित है।
पेड़ों की कटाई से इनकार
दस्तावेजों में पेड़ कटाई नहीं होने की बात कही गई, जबकि मौके पर कई पेड़ों पर कटाई के निशान और नंबर दर्ज पाए गए।
दुर्लभ प्रजातियों की अनदेखी
स्थानीय पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि क्षेत्र में दुर्लभ वन्य प्रजातियां पाई जाती हैं, जिन पर परियोजना का असर पड़ सकता है।
मानव-वन्यजीव संघर्ष से इनकार
स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार क्षेत्र में तेंदुओं और अन्य वन्यजीवों की आवाजाही आम है और कई बार पालतू पशुओं पर हमले की घटनाएं भी हो चुकी हैं।
वैकल्पिक स्थान पर भी उठे सवाल
वन्यजीव कार्यकर्ताओं का कहना है कि प्लांट की पुरानी बंद पड़ी यूनिटों की खाली जमीन पर नई यूनिट स्थापित की जा सकती थी। इससे जंगल और जल स्रोतों को नुकसान नहीं पहुंचता और परियोजना की लागत भी कम हो सकती थी।
वाइल्डलाइफ एक्टिविस्ट आदिल खान ने आरोप लगाया कि जानबूझकर नई जगह का चयन किया गया है। वहीं मध्य प्रदेश वन विभाग के प्रमुख शुभरंजन सेन ने भी कहा कि परियोजना के लिए विभाग से कोई औपचारिक अनुमति नहीं ली गई है।
अब यह मामला पर्यावरण संरक्षण, वन्यजीव सुरक्षा और औद्योगिक विकास के बीच संतुलन को लेकर बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है।
